सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

रूप चतुर्दशी

 सौंदर्य के साथ संवारें भाग्य को (रूप चतुर्दशी)
मित्रों सर्वप्रथम आप सभी को रूपचौदस की ढ़ेर सारी शुभकामनायें, प्रबुद्ध प्रिय पाठकों , कहा जाता है कि शरीर की सुंदर छवि का होना उतना ही आवश्यक है जितना मनुष्य के जीवन निर्वाह में धन की । अतएव इन दोनों अहम वस्तुओं का परस्पर में अनुनाश्रय संबंध है यानी एक के बिना दूसरा अधूरा तो आईए ''ज्योतिष का सूर्य'' के माध्यम से आज आपको इन दोनों अमूल्य पदार्थों को आसानी से एक दिन में ही प्राप्त करने का कुछ विशेष उपाय और गूढ़ रहस्य बताने जा रहा हुं मुझे विश्वास है कि आप जरूर लाभ उठायेंगे...
अवश्यमेव कर्तव्यं स्नानं नरकभीरूणा।। 
पक्षे प्रत्युषसमये स्नानं कुर्यात्प्रयत्नत:।

तैले लक्ष्मी: जले गंगा दीपावल्या चतुर्दशी।
प्रात: स्नानं तु य: कुर्यात् यमलोकं न पश्यति।।

भावार्थ- रूप चतुर्दशी के दिन तेल में लक्ष्मी का वास और जल में गंगा की पवित्रता होती है। इस शुभावसर पर दीप के प्रकाश में जो व्यक्तिप्रात:काल स्नान करता है, वह स्वरूपवान होता है तथा उसके जीवन की परेशानियां दूर होती हैं।

आज रूप चतुर्दशी है। इसे छोटी दिवाली और नरक चौदस भी कहा जाता है। आज के दिन का महत्व स्वच्छता से है।

आज क्या करें : सूर्योदय से पहले उठकर तेल-उबटन से नहाएं। शाम को तिल्ली के तेल के 14 दीपक थाली में सजाएं। फिर हाथ में जल लेकर उन्हें मंदिर में लगाएं।

पौराणिक महत्व :
भगवान वामन ने राजा बलि की पृथ्वी तथा शरीर को तीन पगों में इसी दिन नाप लिया था। हनुमानजी का जन्म भी आज ही हुआ था।

आज के ही दिन श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा ने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था।
कार्तिक माह के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है. नरक चतुर्दशी को नरक चौदस, रुप चौदस, रूप चतुर्दशी, नर्क चतुर्दशी या नरका पूजा के नाम से भी जानते हैं. मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन मुख्य रूप से मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का विधान है
नरक चतुर्दशी को छोटी दीपावली भी कहा जाता है. दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी के दिन संध्या के पश्चात दीपक प्रज्जवलित किए जाते हैं. नरक चतुर्दशी का पूजन कर अकाल मृत्यु से मुक्ति तथा स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए यमराज जी की पूजा उपासना की जाती है. इस रात्रि के पूजन एवं दीप जलाने की प्रथा के संदर्भ में पौराणिक कथाएं तथा कुछ लोक मान्यताएं प्रचलित हैं जो इस पर्व के महत्व को परिलक्षित हैं.
नरक चतुर्दशी पर्व से जुड़ीं कुछ कथाएं
नरक चतुर्दशी के पर्व के साथ अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. एक पौराणिक कथा के अनुसार रन्ति देव नामक एक राजा हुए थे. वह बहुत ही पुण्यात्मा और धर्मात्मा पुरूष थे सदैव धर्म कर्म के कार्यों में लगे रहते थे. जब उनका अंतिम समय आया तो यमराज के दूत उन्हें लेने के लिए आते हैं. और राजा को नरक में ले जाने के लिए आगे बढते हैं.

यमदूतों को देख कर राजा आश्चर्य चकित हो उनसे पूछते हैं कि मैंने तो कभी कोई अधर्म या पाप नहीं किया है तो फिर आप लोग मुझे नर्क में क्यों भेज रहे हैं. कृपा कर मुझे मेरा अपराध बताएं जिस कारण मुझे नरक का भागी होना पड़ रहा है. राजा की करूणा भरी वाणी सुनकर यमदूत उनसे कहते हैं कि, हे राजन एक बार तुम्हारे द्वार से एक ब्राह्मण भूखा ही लौट गया जिस कारण तुम्हें नरक जाना पड़ रहा है.

यह सुनकर राजा यमदूतों से विनती करते हुए कहते हैं कि वह उसे एक वर्ष का और समय देने की कृपा करें. राजा का कथन सुनकर यमदूत विचार करने लगते हैं और राजा की आयु एक वर्ष बढा़ देते हैं. यमदूतों के जाने पर राजा इस समस्या के निदान के लिए ऋषियों के पास जाता हैं, उन्हें सारा वृतान्त सुनाता है.

ऋषि राजा से कहते हैं कि यदि राजन कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें. ब्रह्मणों को भोजन करवा कर उनसे अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें तो वह इस पाप से मुक्त हो सकते हैं. ऋषियों के कथन अनुसार राजा कार्तिक माह की कृष्ण चतुर्दशी का व्रत करता है और इस प्रकार राजा पाप मुक्त हो कर विष्णु लोक में स्थान पाता है. तभी से पापों एवं नर्क से मुक्ति हेतु कार्तिक चतुर्दशी व्रत प्रचलित है.

एक अन्य कथा अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने कार्तिक माह को कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन नरकासुर का वध करके, देवताओं व ऋषियों को उसके आतंक से मुक्ति दिलवाई थी. इसके साथ ही साथ श्री कृष्ण भगवान ने सोलह हजार कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त करवाया था. इस उपलक्ष पर नगर वासियों ने नगर को दीपों से प्रकाशित किया और उत्सव मनाया तभी से नरक चतुर्दशी का त्यौहार मनाया जाने लगा.
रूप चतुर्दशी
नरक चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी भी कहते हैं. रूप चतुर्दशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करनी चाहिए ऎसा करने से रूप सौंदर्य की प्राप्ति होती है. रूप चतुर्दशी से संबंधित एक कथा भी प्रचलित है मान्यता है कि प्राचीन समय पहले हिरण्यगर्भ नामक राज्य में एक योगी रहा करते थे. एक बार योगीराज ने प्रभु को पाने की इच्छा से समाधि धारण करने का प्रयास किया. अपनी इस तपस्या के दौरान उन्हें अनेक कष्टों का सामना करना पडा़. उनकी देह पर कीड़े पड़ गए, बालों, रोओं और भौंहों पर जुएँ पैदा हो गई.

अपनी इतनी विभत्स दशा के कारण वह बहुत दुखी होते हैं. तभी विचरण करते हुए नारद जी उन योगी राज जी के पास आते हैं और उन योगीराज से उनके दुख का कारण पूछते हैं. योगीराज उनसे कहते हैं कि, हे मुनिवर मैं प्रभु को पाने के लिए उनकी भक्ति में लीन रहा परंतु मुझे इस कारण अनेक कष्ट हुए हैं ऎसा क्यों हुआ? योगी के करूणा भरे वचन सुनकर नारदजी उनसे कहते हैं, हे योगीराज तुमने मार्ग तो उचित अपनाया किंतु देह आचार का पालन नहीं जान पाए इस कारण तुम्हारी यह दशा हुई है.

नारद जी के कथन को सुन, योगीराज उनसे देह आचार के विषय में पूछते हैं इस पर नारदजी उन्हें कहते हैं कि सर्वप्रथम आप कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन व्रत रखकर भगवान की पूजा अराधना करें क्योंकि ऎसा करने से आपका शरीर पुन: पहले जैसा स्वस्थ और रूपवान हो जाएगा. तब आप मेरे द्वारा बताए गए देह आचार को कर सकेंगे. नारद जी के वचन सुन योगीराज ने वैसा ही किया और उस व्रत के फलस्वरूप उनका शरीर पहले जैसा स्वस्थ एवं सुंदर हो गया. अत: तभी से इस चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी के नाम से जाना जाने लगा.

नरक चतुर्दशी पूजा । छोटी दिवाली पूजा विधि

नरक चतुर्दशी के दिन सुबह के समय आटा, तेल और हल्दी को मिलाकर उबटन तैयार किया जाता है. इस उबटन को शरीर पर लगाकर, अपामार्ग (चिचड़ी) की पत्तियों को जल में डालकर स्नान करते हैं. इस दिन विशेष पूजा की जाती है जो इस प्रकार होती है, सर्वप्रथम एक थाल को सजाकर उसमें एक चौमुख दिया जलाते हैं तथा सोलह छोटे दीप और जलाएं तत्पश्चात रोली खीर, गुड़, अबीर, गुलाल, तथा फूल इत्यादि से ईष्ट देव की पूजा करें. इसके बाद अपने कार्य स्थान की पूजा करें. पूजा के बाद सभी दीयों को घर के अलग अलग स्थानों पर रख दें तथा गणेश एवं लक्ष्मी के आगे धूप दीप जलाएं. इसके पश्चात संध्या समय दीपदान करते हैं जो यम देवता, यमराज के लिए किया जाता है. विधि-विधान से पूजा करने पर व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो प्रभु को पाता है
-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे-०९८२७१९८८२८, भिलाई, दुर्ग( छ ग.)

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

धनतेरस की मान्यतायें एवं शुभ मुहूर्त


24-10-2011 को धनतेरस है

धनतेरस की मान्यतायें एवं शुभ मुहूर्त में क्या करें और कैसे..?
ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे -09827198828

मित्रों कल धनत्रयोदशी का पावन पर्व है सर्वप्रथम ''ज्योतिष का सूर्य'' परिवार के तरफ से आप सभी को ढ़ेर सारी मनोवांछित शुभकामनायें...कल धन के देवता कुबेर और मृत्यु देवता यमराज की पूजा का विशेष महत्व है । इसी दिन देवताओं के वैद्य धनवंतरि ऋषि अमृत कलश सहित सागर मंथन से प्रकट हुए थे । अतः इस दिन धनवंतरी जयंती मनायी जाती है । निरोग रहते हेतु उनका पूजन किया जाता है । इस दिन अपने सामथ्र्य अनुसार किसी भी रुप मे चादी एवं अन्य धातु खरीदना अति शुभ है । धन संपति की प्राप्ति हेतु कुबेर देवता के लिए घर के पूजा स्थल पर दीप दान करें एवं मृत्यु देवता यमराज ( जो अकाल मृत्यु से करता है ) के लिए मुख्य द्वार पर भी दीप दान करें ।

कार्तिक मास की कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस कहते हैं। आज के दिन घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर रखा जाता है। आज के दिन नये बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। धनतेरस के दिन यमराज और भगवान धनवन्तरि की पूजा का महत्व है।
पंचांग के अनुसार हर साल कार्तिक कृष्ण की त्रयोदशी के दिन धन्वतरि त्रयोदशी मनायी जाती है। जिसे आम बोलचाल में ‘धनतेरस’ कहा जाता है। यह मूलतः धन्वन्तरि जयंती का पर्व है और आयुर्वेद के जनक धन्वन्तरि के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है।

धनतेरस के दिन नए बर्तन या सोना-चांदी खरीदने की परम्परा है। इस पर्व पर बर्तन खरीदने की शुरआत कब और कैसे हुई, इसका कोई निश्चित प्रमाण तो नहीं है लेकिन ऐसा माना जाता है कि जन्म के समय धन्वन्तरि के हाथों में अमृत कलश था। यही कारण होगा कि लोग इस दिन बर्तन खरीदना शुभ मानते हैं।

आने वाली पीढ़ियां अपनी परम्परा को अच्छी तरह समझ सकें, इसके लिए भारतीय संस्कृति के हर पर्व से जुड़ी कोई न कोई लोककथा अवश्य है। दीपावली से पहले मनाए जाने वाले धनतेरस पर्व से  भी जुड़ी एक लोककथा है, जो कई युगों से कही-सुनी जा रही है।

पौराणिक कथाओं में धन्वन्तरि के जन्म का वर्णन करते हुए बताया गया है कि देवता और असुरों के समुद्र मंथन से धन्वन्तरि का जन्म हुआ था। वह अपने हाथों में अमृत-कलश लिए प्रकट हुए थे। इस कारण उनका नाम ‘पीयूषपाणि धन्वन्तरि’ विख्यात हुआ। उन्हें विष्णु का अवतार भी माना जाता है।

परम्परा के अनुसार धनतेरस की संध्या को यम के नाम का दीया घर की देहरी पर रखा जाता है और उनकी पूजा करके प्रार्थना की जाती है कि वह घर में प्रवेश नहीं करें और किसी को कष्ट नहीं पहुंचाएं। देखा जाए तो यह धार्मिक मान्यता मनुष्य के स्वास्थ्य और दीर्घायु जीवन से प्रेरित है।

यम के नाम से  दीया निकालने के बारे में भी एक पौराणिक कथा है- एक बार राजा हिम ने अपने पुत्र की  कुंडली बनवाई, इसमें यह बात सामने आयी कि शादी के ठीक चौथे दिन सांप के काटने से  उसकी मौत हो जाएगी। हिम की पुत्रवधू को जब इस बात का पता चला तो उसने निश्चय किया कि वह हर हाल में अपने पति को यम के कोप से बचाएगी।  शादी के चौथे दिन उसने पति के कमरे के बाहर घर के सभी जेवर और सोने-चांदी के सिक्कों का ढेर बनाकर उसे पहाड़ का रूप दे दिया और खुद रात भर बैठकर उसे गाना और कहानी सुनाने लगी ताकि उसे नींद नहीं आए।

रात के समय जब यम सांप के रूप में उसके पति को डंसने आया तो वह आभूषणों के पहाड़ को पार नहीं कर सका और उसी ढेर पर बैठकर गाना सुनने लगा। इस तरह पूरी रात बीत गई। अगली सुबह सांप को लौटना पड़ा। इस तरह उसने अपने पति की जान बचा ली। माना जाता है कि तभी से लोग घर की सुख-समृद्धि के लिए धनतेरस के दिन अपने घर के बाहर यम  के नाम का दीया निकालते हैं ताकि यम उनके परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुंचाए।

भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य का स्थान धन से ऊपर माना जाता रहा है। यह कहावत आज भी प्रचलित है कि “पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में माया” इसलिए दीपावली में सबसे पहले धनतेरस को महत्व दिया जाता है। जो भारतीय संस्कृति के सर्वथा अनुकूल  है।

धनतेरस के दिन सोने और चांदी के बर्तन, सिक्के तथा आभूषण खरीदने की परम्परा रही है। सोना सौंदर्य में वृद्धि तो करता ही है, मुश्किल घड़ी में संचित धन के रूप में भी काम आता है। कुछ लोग शगुन के रूप में सोने या चांदी के सिक्के भी खरीदते हैं।

बदलते दौर के साथ लोगों की पसंद और जरूरत भी बदली है इसलिए इस दिन अब बर्तनों और आभूषणों के अलावा वाहन, मोबाइल आदि भी खरीदे जाने लगे हैं। वर्तमान समय में देखा जाए तो मध्यमवर्गीय परिवारों में धनतेरस के दिन वाहन खरीदने का फैशन सा बन गया है।  इस दिन ये लोग गाड़ी खरीदना शुभ मानते हैं। कई लोग तो इस दिन कम्प्यूटर और बिजली के उपकरण भी खरीदते हैं।

रीति-रिवाजों से जुड़ा धनतेरस आज व्यक्ति की आर्थिक क्षमता का सूचक बन गया है। एक तरफ उच्च और मध्यम वर्ग के लोग धनतेरस के दिन विलासिता से भरपूर वस्तुएं खरीदते हैं तो दूसरी ओर निम्न वर्ग के लोग जरूरत की वस्तुएं खरीद कर धनतेरस का पर्व मनाते हैं। इसके बावजूद वैश्वीकरण के इस दौर में भी लोग अपनी परम्परा को नहीं भूले हैं और अपने सामर्थ्य के अनुसार यह पर्व मनाते हैं।
भगवान धन्वंतरि पूजन इस बार 3 नवंबर 2010, बुधवार को प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी है जो 4.57 मिनट से लगेगी। इस समय प्रदोष काल 5.41 से 8.27 तक रहेगा। शाम 5.42 से 7.11 तक लाभ का चौघड़‍िया रहेगा फिर अमृत 7.11 से 8.40 तक रहेगा। जो प्रदोषकाल में आता है अतः इस समयावधि में गादी बिछाने एवं भगवान धन्वंतरि का पूजन करना श्रेष्ठ है।

रुप चौदस , नरक चतुर्दशी एवं हनुमान जयंतीः इसे छोटी दीपावली भी कहते है । इस दिन रुप और सौदर्य प्रदान करने वाले देवता श्री कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए पूजा की जाती है । इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था और राक्षस बारासुर द्वारा बंदी बनायी गयी सोलह हजार एक सौ कन्याओं को मुक्ति दिलायी थी । अतः नरक चतुर्दशी मनायी जाती है । दूसरो अर्थात गंदगी है उसका अंत जरुरी है । इस दिन अपने घर की सफाई अवश्य करें । रुप और सौंदर्य प्राप्ति हेतु इस दिन शरीर पर उबटन लगाकर स्नान करें । अंजली पुत्र बजरंगबलि हनुमान का जन्म कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में हुआ था अतः हनुमान जयंती भी इसी दिन मनायी जाती है । सांय काल उनका पूजन एवं सुंदर कांड का पाठ अवश्य करें ।
 

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

अंतर्मन में उठ रहे कुछ सवालों के जवाब

आपका करियर और आपकी कुंडली
--ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे-09827198828
किसी शायर ने कहा है कि तरक्कीयों के दौर में उसी का तरीका चल गया, बनाके अपना रास्ता जो भीड़ से आगे निकल गया। यानी सवा सौ करोड़ की आबादी वाले इस देश में अपनी मेहनत के बल पर पहचान बनाना आसान काम नहीं है। किंतु कर्म और भाग्य का सही तालमेल बैठ जाये तो सब कुछ संभव है। जीवन की यात्रा में मार्ग वही चुनें जो आपके स्वभाव के अनुसार हो। जहां आपको लगे कि यह काम मैं इस क्षेत्र में बेहतर कर सकता हूं, उसी कार्य को करें। अब आपके मन में प्रश्न उठ रहा होगा कि हमें कैसे पता कि किस क्षेत्र में हमें कामयाबी मिलेगी और क्या काम हमारे लिये बेहतर रहेगा। आपको जानकर खुशी होगी कि इसका सीधा जवाब ज्योतिष विज्ञान के पास है। आप स्वयं ही अपनी कुंडली के ग्रहों के आधार पर अपने करियर का चुनाव कर सकते हैं, अथवा किसी ज्योतिषी को अपनी कुंडली दिखाकर उनसे सलाह ले सकते हैं। ऐसे ही अंतर्मन में उठ रहे कुछ सवालों के जवाब इस आलेख http://ptvinodchoubey.blogspot.com/ में देने का प्रयास कर रहा हूं।

सामान्यत: वैदिक ग्रंथों के अनुसार सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरू और शनि इन सात ग्रहों का अपना अलग-अलग क्षेत्र और प्रभाव है। लेकिन, जब इन ग्रहों का आपसी योग बनता है तो क्षेत्र और प्रभाव बदल जाते हैं। इन ग्रहों के साथ राहु और केतु मिल जाये, तो कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं। व्यवहारिक भाशा में कहें तो टांग अड़ाते हैं। जन्मकुंडली के मुख्य कारक ग्रह ही कुंडली के प्रेसिडेंट होते हैं। यानी जो भी कुछ होगा वह उन ग्रहों की देखरेख में होगा, अत: यह ध्यान में जरूर रखें कि इस कुंडली में कारक ग्रह कौन से हैं। अगर कारक ग्रह कमजोर हैं या अस्त है, वृद्धावस्था में हैं तो उसके बाद वाले ग्रहों का असर आरंभ हो जायेगा। मंगल, शुक्र और सूर्य, शनि करियर की दशा तय करते हैं। बुध और गुरु उस क्षेत्र की बुद्धि और शिक्षा प्रदान करते हैं। यद्यपि क्षेत्र इनका भी निश्चित है, लेकिन इन पर जिम्मेदारियां ज्यादा रहती हैं। इसलिये कुंडली में इनकी शक्ति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आज हम किसी एक या दो ग्रहों के करियर पर प्रभाव की चर्चा करेंगे। जन्मकुंडली में वैसे तो सभी बारह भाव एक दूसरे को पूरक हैं, किंतु पराक्रम, ज्ञान, कर्म और लाभ इनमें महत्?वपूर्ण है। इसके साथ ही इन सभी भावों का प्रभाव नवम भाग्य भाव से तय होता है। अत: यह परम भाव है।

सूर्य और मंगल यानी सोच और साहस के परम शुभ ग्रह माने गये हैं। सूर्य को कुंडली की आत्मा कहा गया है। और शोधपरक, आविष्कारक, रचनात्मक क्षेत्र से संबंधित कार्यों में इनका खास दखल रहता है। मशीनरी अथवा वैज्ञानिक कार्यों की सफलता सूर्यदेव के बगैर संभव ही नहीं है। जब यही  सूक्ष्म कार्य मानव शरीर से जुड़ जाता है तो शुक्र का रोल आरंभ हो जाता है, क्योंकि मेंडिकल एस्ट्रोजॉली में शुक्र तंत्रिका तंत्र विज्ञान के कारक हैं। यानी शुक्र को न्यूरोलॉजी और गुप्त रोग का ज्ञान देने वाला माना गया है। सजीव में शुक्र का रोल अधिक रहता है और निर्जीव में सूर्य का रोल अधिक रहता है। यदि आपकी कुंडली में ये दोनों ग्रह एक साथ हैं और दक्ष अंश की दूरी पर हैं तो ह मानकर चलें कि इनका फल आपके ऊपर अधिक घटित होगा। तीसरे भाव, पांचवें भाव, दशम भाव और एकादश भाव में इनकी स्थिति आपके कुशल वैज्ञानिक, आविश्कारक, डॉक्टर, संगीतज्ञ, फैशन डिजाइनर, हार्ट अथवा न्यूरो सर्जन बना सकती है। इन दोनों की युति में शुक्र बलवान हों, तो स्त्री रोग विशेषज्ञ बना सकते हैं। साथ ही ललित कला और फिल्म उद्योग में संगीतकार आदि बन सकते हैं। लेकिन, जब इन्हीं सूर्य के साथ मंगल मिले हैं, तो पुलिस, सेना, इंजीनियर, अग्निशमन विभाग, कृषि कार्य, जमीन-जायदाद, ठेकेदारी, सर्जरी,  खेल, राजनीति तथा अन्य प्रबंधन कार्य के क्षेत्र में अपना भाग्य आजमा सकते हैं। यदि इनकी युति पराक्रम भाव में दशम अथवा एकादश भाव में हो इंजीनियरिंग, आईआईटी वैज्ञानिक बनने के साथ-साथ अच्छे खिलाड़ी और प्रशासक बनना लगभग सुनिश्चित कर देती है। अधिकतर वैज्ञानिक, खिलाडिय़ों और प्रभावशाली व्यक्तियों की कुंडली में यह युति और योग देखे जा सकते हैं। आज के प्रोफेशनल युग में इनका प्रभाव और फल चरम पर रहता है। इसलिये यह मानकर चलें कि यदि कुंडली में मंगल, सूर्य तीसरे दसवे या ग्याहरवें भाव में हो तो अन्य ग्रहों के द्वारा बने हयु योगों को ध्यान में रखकर उपरोक्त कहे गये क्षेत्रों में अपना भाग्य आजमाना चाहिये। यदि इनके साथ बुध भी जुड़ जायें तो एजुकेशन, बैंक और बीमा क्षेत्र में किस्मत आजमा सकते हैं। लेकिन, इसके लिये कुंडली में बुध ओर गुरु की स्थिति पर ध्यान देने की जरूरत है। वास्तुकला तथा अन्य नक्काशी वाले क्षेत्रों के दरवाजे भी आपके लिये खुल जायेंगे, इसलिये कुंडली में अगर सूर्य, मंगल की प्रधानता हो तो इनके कारक अथवा संबंधित क्षेत्र अति लाभदायक और कामयाबी दिलाने वाले रहेंगे, इसलिये जो बेहतर और आपकी प्रकृति को सूट करे वही क्षेत्र चुनें।  
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें..09827198828 (प्रति प्रश्न मात्र 1100 रू .)

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

अहोई अष्टमी व्रत विधि

अहोई अष्टमी व्रत

फेसबुकिया सभी मित्रों एवं ब्लाग पढ़ने वाले आदरणीय श्रेष्ठ जनों को अहोई अष्टमी पर्व की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं
आज के (१९अक्टूबर२०११) दिन अहोई अष्टमी का व्रत किया जायेगा. अहोई अष्टमी का व्रत अहोई आठे के नाम से भी जाना जाता है. यह व्रत कार्तिक मास की अष्टमी तिथि के दिन संतानवती स्त्रियों के द्वारा किया जाता है. अहोई अष्टमी का पर्व मुख्य रुप से अपनी संतान की लम्बी आयु की कामना के लिये किया जाता है.

इस पर्व के विषय में एक ध्यान देने योग्य पक्ष यह है कि इस व्रत को उसी वार को किया जाता है. जिस वार को दिपावली हों, जैसे वर्ष 2011 में अहोई अष्टमी का पर्व अष्टमी के दिन न करके सप्तमी तिथि में किया जायेगा. क्योकि वर्ष 2011 में दिपावली बुधवार के दिन की है. इसलिये इस वर्ष में इसे सप्तमी तिथि के दिन ही किया जायेगा.

अहोई अष्टमी व्रत संक्षिप्त विधि

संतान की शुभता को बनाये रखने के लिये क्योकि यह उपवास किया जाता है. इसलिये इसे केवल माताएं ही करती है. एक मान्यता के अनुसार इस दिन से दीपावली का प्रारम्भ समझा जाता है. अहोई अष्टमी के उपवास को करने वाली माताएं इस दिन प्रात:काल में उठकर, एक कोरे करवे (मिट्टी का बर्तन) में पानी भर कर. माता अहोई की पूजा करती है. पूरे दिन बिना कुछ खाये व्रत किया जाता है. सांय काल में माता को फलों का भोग लगाकर, फिर से पूजन किया जाता है.

तथा सांयकाल में तारे दिखाई देने के समय अहोई का पूजन किया जाता है. तारों को करवे से अर्ध्य दिया जाता है. और गेरूवे रंग से दीवार पर अहोई मनाई जाती है. जिसका सांयकाल में पूजन किया जाता है. कुछ मीठा बनाकर, माता को भोग लगा कर संतान के हाथ से पानी पीकर व्रत का समापन किया जाता है. अहोई अष्टमी के व्रत की विधि विस्तार में निम्न है.

अहोई अष्टमी व्रत विधि विस्तार से
अहोई व्रत के दिन व्रत करने वाली माताएं प्रात: उठकर स्नान करे, और पूजा पाठ करके अपनी संतान की दीर्घायु व सुखमय जीवन हेतू कामना करती है. और माता अहोई से प्रार्थना करती है, कि हे माता मैं अपनी संतान की उन्नति, शुभता और आयु वृ्द्धि के लिये व्रत कर रही हूं, इस व्रत को पूरा करने की आप मुझे शक्ति दें. यह कर कर व्रत का संकल्प लें. एक मान्यता के अनुसार इस व्रत को करने से संतान की आयु में वृ्द्धि, स्वास्थय और सुख प्राप्त होता है. साथ ही माता पार्वती की पूजा भी इसके साथ-साथ की जाती है. क्योकि माता पार्वती भी संतान की रक्षा करने वाली माता कही गई है.

उपवास करने वाली स्त्रियों को व्रत के दिन क्रोध करने से बचना चाहिए. और उपवास के दिन मन में बुरा विचार लाने से व्रत के पुन्य फलों में कमी होती है. इसके साथ ही व्रत वाले दिन, दिन की अवधि में सोना नहीं चाहिए. अहोई माता की पूजा करने के लिये अहोई माता का चित्र गेरूवे रंग से मनाया जाता है. इस चित्र में माता, सेह और उसके सात पुत्रों को अंकित किया जाता है. संध्या काल में इन चित्रों की पूजा की जाती है.

सायंकाल की पूजा करने के बाद अहोई माता की कथा का श्रवण किया जाता है. इसके पश्चात सास-ससुर और घर में बडों के पैर छुकर आशिर्वाद लिया जाता है. तारे निकलने पर इस व्रत का समापन किया जाता है. तारों को करवे से अर्ध्य दिया जाता है. और तारों की आरती उतारी जाती है. इसके पश्चात संतान से जल ग्रहण कर, व्रत का समापन किया जाता है.

अहोई व्रत कथा
अहोई अष्टमी की व्रत कथा के अनुसार किसी नगर में एक साहूकार रहता था. उसके सात लडके थें. दीपावली आने में केवल सात दिन शेष थें, इसलिये घर की साफ -सफाई के कार्य घर में चल रहे थे, इसी कार्य के लिये साहुकार की पत्नी घर की लीपा-पोती के लिये नदी के पास की खादान से मिट्टी लेने गई. खदान में जिस जगह मिट्टी खोद रही थी, वहीं पर एक सेह की मांद थी. स्त्री की कुदाल लगने से सेह के एक बच्चे की मृ्त्यु हो गई.

यह देख साहूकार की पत्नी को बहुत दु:ख हुआ. शोकाकुल वह अपने घर लौट आई. सेह के श्राप से कुछ दिन बाद उसके बडे बेटे का निधन हो गया. फिर दूसरे बेटे की मृ्त्यु हो गई, और इसी प्रकार तीसरी संतान भी उसकी नहीं रही, एक वर्ष में उसकी सातों संतान मृ्त्यु को प्राप्त हो गई.

अपनी सभी संतानों की मृ्त्यु के कारण वह स्त्री अत्यंत दु:खी रहने लगी. एक दिन उसने रोते हुए अपनी दु:ख भरी कथा अपने आस- पडोस कि महिलाओं को बताई, कि उसने जान-बुझकर को पाप नहीं किया है. अनजाने में उससे सेह के बच्चे की हत्या हो गई थी. उसके बाद मेरे सातों बेटों की मृ्त्यु हो गई. यह सुनकर पडोस की वृ्द्ध महिला ने उसे दिलासा दिया. और कहा की तुमने जो पश्चाताप किया है उससे तुम्हारा आधा पाप नष्ट हो गया है.

तुम माता अहोई अष्टमी के दिन माता भगवती की शरण लेकर सेह और सेह के बच्चों का चित्र बनाकर उनकी आराधना कर, क्षमा याचना करों, तुम्हारा कल्याण होगा. ईश्वर की कृपा से तुम्हारा पाप समाप्त हो जायेगा. साहूकार की पत्नी ने वृ्द्ध महिला की बात मानकार कार्तिक मास की कृ्ष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का व्रत कर माता अहोई की पूजा की, वह हर वर्ष नियमित रुप से ऎसा करने लगी, समय के साथ उसे सात पुत्रों की प्राप्ति हुई, तभी से अहोई व्रत की परम्परा प्रारम्भ हुई है.
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे -09827198828

ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे,09827198828

सफलता की गारंटी है शुभ मुहूर्तों से
 -ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे,09827198828
''ग्रहों की गति के अनुसार विभिन्न ग्रहों व नक्षत्रों के नये नये योग बनते बिगडते रहते हैं। अच्छे योगों की गणना कर उनका उचित समय पर जीवन में इस्तेमाल करना ही शुभ मुहूर्त पर कार्य संपन्न करना कहलाता है। अशुभ योगों में किया गया कार्य पूर्णत: सिद्ध नहीं होता। मुहूर्त शास्त्र के कुछ सरल नियमों का उल्लेख यहां किया गया है जो विभिन्न कार्यों में सफलता में सहायक हो सकता है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र का प्रमुख स्तंभ है ''
दैनिक जीवन में मुहूर्त विचार
दैनिक जीवन के विभिन्न कार्यों के शुरू करने के शुभ व अशुभ समय को मुहूर्त का नाम दिया गया है। यह ज्योतिष में लग्न कुंडली की तरह ही महत्वपूर्ण है जो भाग्य का क्षणिक पल भी कहलाता है। अच्छा मुहूर्त कार्य की सफलता देकर हमारे भाग्य को भी प्रभावित करता है और यदि अच्छा मुहूर्त हमारा भाग्य नहीं बदल सकता तो कार्य की सफलता के पथ को सुगम तो बना सकता है। भविष्य बदले या न बदले परंतु जीवन के प्रमुख कार्य यदि शुभ मुहूर्त में किये जायें तो व्यक्ति का जीवन आनंददायक और खुशहाल बन जाता है। मुहूर्त की गणना उन लोगों के लिये भी लाभदायक हैं जो अपना जन्म-विवरण नहीं जानते। ऐसे लोग शुभ मुहूर्त की मदद से अपने प्रत्येक कार्य में सफल होते देखे गये हैं। दिन में 15 व रात के 15 मुहूर्त मिलाकर कुल 30 मुहूर्त होते हैं। 
शुभ मुहूर्त निकालवाते समय रखें ध्यान 
- नवग्रह स्थिति, नक्षत्र, वार, तिथि, मल मास, अधिक मास,शुक्र  व गुरू अस्त, अशुभ  योग, भद्रा, शुभ लग्न, शुभ योग, राहू काल। शुभ मुहूर्तों में सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है - गुरु-पुष्य। यदि गुरूवार को चंद्रमा पुष्य नक्षत्र में हो तो इससे पूर्ण सिद्धिदायक योग बन जाता है। जब चतुर्दशी, सोमवार को और पूर्णिमा या अमावस्या मंगलवार को हो तो सिद्धि दायक मुहूर्त होता है। दैनिक जीवन के निम्न कार्यों के लिये सरल शुभ मुहूर्त का विचार निम्न प्रकार से किया जाना चाहिये :- 
1 बच्चे का नामकरण करना :- इस कार्य के लिये 2, 3, 7, 10, 11 व 13वीं तिथियां शुभ रहती हैं। सोमवार, बुधवार, गुरूवार व शुक्रवार के दिन बच्चे का नामकरण किया जाना चाहिये। शुभ नक्षत्र अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा व रेवती हैं।
2. विद्याध्ययन :- बच्चे का किसी विद्यालय में प्रवेश देवशयन तिथियों में नहीं करना चाहिये। शुभ तिथियां 2, 3, 5, 7, 10, 11, 12, 13 व पूर्णिमा हैं। शुभ वार सोमवार, बुधवार, गुरूवार व शुक्रवार हैं। शुभ नक्षत्र अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुर्नवसु, पुष्य, उतरा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा हैं।
3. सरकारी नौकरी शुरू करना :- शुभ मुहूर्त में सरकारी नौकरी शुरू करने से बाधायें कम आती हैं व आत्मसंतुष्टि अधिक रहती है। इसके लिये नौकरी के पहले दिन का नक्षत्र हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजीत, मृगशिरा, रेवती, चित्रा या अनुराधा होना चाहिये। तिथियों में चतुर्थी, नवमी व चर्तुदशी को छोडकर कोई भी तिथि हो सकती है। सोमवार, बुधवार, गुरूवार या शुक्रवार को सरकारी नौकरी शुरू करनी चाहिये। मुहूर्त कुंडली में गुरू सातवें भाव में हो, शनि छटे भाव में, सूर्य या मंगल तीसरे, दसवें या एकादश भाव में हो तो शुभ रहता है। जन्म राशि से 4, 8 या 12वें भाव के चंद्रमा से बचना चाहिये।
4. नया व्यापार आरम्भ करना :- रिक्ता तिथि में नहीं करना चाहिये। एग्रीमेंट कभी भी रविवार, मंगलवार या शनिवार को नहीं करना चाहिये। तिथि का क्षय भी नहीं होना चाहिये। 
5. नयी दुकान खोलना :- सफलतापूर्वक दुकान चलाने के लिये दुकान को शुभ मुहूर्त में खोलना अनिवार्य है। शुभ मुहूर्त हेतु तीनो उतरा नक्षत्र, रोहिणी, मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, रेवती में ही दुकान का उद्घाटन करना चाहिये। चंद्रमा व शुक्र के लग्न में दुकान खोलना शुभ रहता है। 2, 10 व 11वें भाव में शुभ ग्रह होने चाहियें। रिक्ता तिथियों के अतिरिक्त सभी तिथियां दुकान खोलने के लिये श्ुाभ रहती हैं। मंगलवार के अतिरिक्त किसी भी वार को दुकान खोली जा सकती है। जातक की जन्म राशि से 4, 8 या 12वें भाव में चंद्रमा भ्रमण नहीं कर रहा होना चाहिये।
6. बच्चा गोद लेना :- विवाह के बाद हर पति-पत्नि को संतान प्राप्त करने की इच्छा होती है। यदि किन्हीं कारण से दंपति को यह सुख नहीं मिल पाता तो वे किसी बच्चे को गोद लेने जैसे पुण्य कार्य की सोचते हैं। ऐसे बच्चे भी दंपति के लिये सुख दायक सिद्ध हो तो इसके लिये बच्चे को शुभ मुहूर्त में ही गोद लेना चाहिये। इसके लिये उस समय का नक्षत्र, वार, तिथि और लग्न देखना चाहिये। पुष्य, अनुराधा व पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में बच्चा गोद लिया जाना चाहिये। तिथियों में प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी व त्रयोदशी तिथि होनी चाहिये। रविवार, मंगलवार, गुरूवार व शुक्रवार के दिन बच्चा गोद लेना शुभ माना गया है। मुहूर्त कुंडली के पांचवे, नवें व दसवें भाव में शुभ ग्रह हों तथा ये भाव बलवान हों तो बच्चा गोद लेने का समय शुभ होता है। 
7. वाहन खरीदना :- स्कूटर, कारादि क्रय करने के लिये शुभ तिथियां 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 12, 13 व पुर्णिमा है। शुभ वार सोमवार, बुधवार, गुरूवार व शुक्रवार हैं। शुभ नक्षत्र अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, तीनो उतरा, तीनो पूर्वा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवती हैं। 
8. ऋण लेना :- बुधवार को किसी तरह का ऋण नहीं देना चाहिये। मंगलवार को किसी से ऋण नहीं लेना चाहिये।
9. मुकदमा दायर करना :- न्यायालय से अपने हक में न्याय पाने के लिये मुहूर्त के कुछ नियमों को ध्यान में रखना चाहिये। इसके लिये शुभ नक्षत्र इस प्रकार से हैं - स्वाती, भरणी, आश्लेषा, धनिष्ठा, रेवती, हस्त, पुनर्वसु, अनुराधा, तीनो उत्तरा। इन नक्षत्रों के दिनों में मुकदमा दायर करना चाहिये। तिथियों में प्रतिपदा, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, नवमी, एकादशी, त्रयोदशी या पूर्णिमा होनी चाहिये। वार में सोमवार, गुरूवार या शनिवार शुभ रहते हैं।
10. नींव खोदना :- शिलान्यास करने के लिये शुभ तिथियां 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 12, 13 व पूर्णिमा है। शुभ वार सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार व शनिवार हैं। शुभ नक्षत्र रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, तीनो उतरा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, धनिष्ठा, शतभिषा, रेवती हैं।
11. नये गृह प्रवेश :- नवनिर्मित घर में प्रवेश के लिये शुभ तिथियां 2, 3, 5, 7, 10, 11, 13 व पूर्णिमा है। शुभ वार सोमवार, बुधवार, शुक्रवार व शनिवार हैं। शुभ नक्षत्र अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, तीनो उतरा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवती हैं।
कुछ विशेष मुहूर्त
- उपरोक्त लिखे कार्य-विशेष मुहूर्तों के अतिरिक्त निम्न दो प्रकार के मुहूर्त कुछ अधिक ही विशेष कहलाते हैं जिनमें शुभ नक्षत्र, तिथि या वार नहीं देखा जाता। इन विशेष मुहूर्तों में किये गये कार्य अक्सर सफल ही रहते हैं - 1. अभिजित मुहूर्त - ज्योतिष में अभिजित को 28वां नक्षत्र माना गया है। इसके स्वामी ब्रम्हा व राशि मकर हैं। दिन के अष्टम मुहूर्त को अभिजित मुहूर्त कहते हैं। इसका समय मध्याह्न से 24 मिनट पूर्व तथा मध्याह्न के 24 मिनट बाद तक माना गया है। अत: प्रत्येक दिन स्थानीय समय के लगभग 11:36 से 12:24 तक के समय को विजय या अभिजित मुहूर्त कहते हैं। इसमें किये गये सभी कार्य सफल सिद्ध होते हैं। ऐसे में लग्न शुद्धि भी देखने की आवश्यकता नहीं होती। यह विशेष काल सभी दोषों को नष्ट कर देता है। अभिजित नक्षत्र में जिस बालक का जन्म होता है, उसका राजा योग होता है, व्यापार में उसे हमेशा लाभ रहता है।
2. अबूझ मुहूर्त - कुछ तिथियां ऐसी होती हैं जो शुभ मुहूर्त की तरह से काम करती हैं। इस दिन कोई भी शुभ कार्य बिना मुहूर्त निकलवाये किया जा सकता है। ऐसी कुछ तिथियां हैं - अक्षय तृतीया, नवीन संवत, फुलेरा दूज, दशहरा, राम नवमी, भड्डली नवमी, शीतला अष्टमी, बैशाखी। मुहूर्त शास्त्र के कुछ सरल नियम जो शुभ मुहूर्त को निकलवाने जैसे चक्करों से बचना चाहते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिये ही नीचे कुछ सरल से नियम दिये जा रहे हैं जो विभिन्न कार्यो में सफलता दायक सिद्ध हो सकते हैं :- यात्रा के लिये रिक्ता तिथि को यात्रा नहीं करनी चाहिये। 4, 9, 14 रिक्ता तिथियां होती हैं। यदि गोचर में वार स्वामी वक्री हो तो भी यात्रा निषेध है। यदि वक्री ग्रह यात्रा लग्न से केंद्र में हो तो भी यात्रा अशुभ रहती है। विद्याध्ययन मुहूर्त में द्विस्वभाव लग्न होने पर उसकी प्राप्ति, स्थिर लग्न में मूर्खता व चर लग्न में भ्रांति होती है। विवाह के लिये 1,2,3,8,10,11 राशियों में सूर्य का गोचर शुभ रहता है। विवाह समय की कुंडली में सप्तम स्थान में कोई ग्रह न हो तो शुभ रहता है। विवाह मुहूर्त की कुंडली में चंद्रमा का 8वां व 12वां होना अशुभ रहता है। वक्री गुरू का 28 दिन का समय विवाह हेतु अशुभ होता है। अमावस्या का दिन विवाह के लिये ठीक नहीं है। ज्येष्ठ संतान का ज्येष्ठ मास में विवाह अशुभ होता है। कन्या विवाह के लिये गुरू का गोचर 4,8,12 भाव से अशुभ माना गया है। जन्म राशि, जन्म नक्षत्र का मुहूर्त कन्या के विवाह हेतु शुभ माना गया है। कृष्ण पक्ष की 5वीं व 10वीं तिथियां तथा शुक्लपक्ष की 7वीं व 13वीं तिथियां विवाह हेतु शुभ हैं। सोम, बुध व शुक्रवार विवाह हेतु शुभ रहते हैं। गर्भाधान के लिये बुधवार व शनिवार शुभ नहीं माने जाते क्योंकि ये दोनो दिन नपुंसक माने गये हैं। अपने जन्म नक्षत्र, जन्म तिथि, जन्म माह, ग्रहण दिन, श्राद्ध दिनों में गर्भाधान का फल अशुभ होता है। गृहारंभ के समय सूर्य, चंद्र, गुरू व शुक्र ग्रह नीच के नहीं होने चाहियें। गृह प्रवेश मिथुन, धनु व मीन का सूर्य होने पर नहीं करना चाहिये। शुक्ल पक्ष में गृहारंभ मंगलकारी व कृष्ण पक्ष में अशुभ रहता है। शनिवार को नींव या गृहारंभ अति उतम रहता है। मंगल व रविवार को निर्माण कार्य शुरू नहीं करना चाहिये तथा नवीन गृह प्रवेश भी नहीं करना चाहिये। निर्माण कार्य का लग्न स्थिर या द्विस्वभाव होना चाहिये। मुकदमा मंगलवार को दायर नहीं करना चाहिये। शनिवार को दायर किया गया मुकदमा लंबा खिांचता है। देव प्रतिष्ठा के लिये चैत्र, फाल्गुन, बैशाख, ज्येष्ठ व माघ मास शुभ होते हैं। श्रावण मास में शिव की, आश्विन में देवी की, मार्गशीर्ष में विष्णु की प्रतिष्ठा करना शुभ है। प्रतिष्ठा में सोम, बुध, गुरू व शुक्रवार शुभ माने गये हैं। जिस देव की जो तिथि हो, उस दिन उस देव की स्थापना शुभ रहती है। युग तिथियां - सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलियुग जिन तिथियों का प्रारंभ ही  उन तिथियों  को शुभ कार्य नहीं करने चाहियें। ये इस प्रकार से हैं :- सतयुग - कार्तिक शुक्लपक्ष की नवमी त्रेतायुग - बैशाख शुक्लपक्ष की तृतीया द्वापरयुग - माघ कृष्णपक्ष की अमावस्या कलियुग - श्रावण कृष्णपक्ष की त्रयोदशी उपाय - यदि उचित मुहूर्त या शुभ योग नहीं मिल रहा हो तो निम्न उपाय कर के कार्य किया जा सकता है :- यदि तारीख तय है तो केवल उस दिन की लग्न शुद्धि करके सब अशुभ योगों का नाश किया जा सकता है। शुभ मुहूर्त न होने पर शुभ होरा/ चौघडिया का चयन कर शुभ फल प्राप्त किया जा सकता है। विवाह का उचित मुहूर्त न मिलने पर अभिजित मुहूर्त में विवाह किया जा सकता है। कार्य का प्रारंभ उसी नक्षत्र में किया जाये जिसका स्वामी ग्रह उच्च, स्व या मित्र राशिगत हो। ऐसा समय चुनना चाहिये जब जातक की अंतर्दशा का स्वामी ग्रह महादशा स्वामी से षडाष्टक या द्वादश न हो। गोचरीय चंद्रमा यदि वक्री ग्रह के नक्षत्र से गोचर कर रहे हों तो वक्री ग्रह का दानादि कर लेना चाहिये। शनि-चंद्र की युति होने पर शनि शांति करवा लेनी चाहिये। यदि कोई कार्य चल रहा हो और मध्य में राहू काल आ जाये तो कार्य रोकने की आवश्यकता नहीं है।
ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे,09827198828 

सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

20 अक्टूबर को लाभकारी चौघडिय़ा मुहूर्त:--

दीपावली के शुभ अवसर पर  खरीदी करना बहुत मायने रखता है (शुभ- मुहूर्त)
ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे महाराज -
यूं तो वैदिक ज्योतिष के अनुसार खरीददारी के लिए श्रेष्ठ मुहूर्त बन रहे हैं 20 अक्टूबर गुरुवार को। इस दिन खरीददारी करना काफी लाभदायक रहेगा..

गुरु पुष्य नक्षत्र योग---

दीपोत्सव के पहले 20 अक्टूबर, गुरुवार को 05 योग के संयोग से 21 घंटे का पुष्य नक्षत्र आने से इस बार गुरु-पुष्य का शुभयोग बन रहा है। इस दिन सर्वार्थसिद्धि, अमृत सिद्धि योग के साथ ही सूर्य-बुध का बुधादित्य और गजकेसरी योग भी है।
एक ही दिन ये पांच शुभ योग बनना सभी के लिए लाभकारी/फायदेमंद है। दीपावली के पहले खरीदी के लिए पुष्य नक्षत्र का खास महत्व माना है। पुष्य नक्षत्र को नक्षत्रों का रजा मन जाता हें..यह 27 नक्षत्रों में श्रेष्ठ हें..
इस दिन घर में नई वस्तुएं लाने से घर पर महालक्ष्मी की विशेष कृपा रहती है।

बाजारों में रहेगी चहल-पहल:

इस दिन गुरु-पुष्य के साथ ही पुनर्वसु नक्षत्र, सर्वार्थसिद्धि, अमृत सिद्धि, बुधादित्य( एक अनुपम योग जो अत्यंत फलदायी हे) और गजकेसरी योग(खरीददारी और करियर/व्यवसाय के लिए श्रेष्ठ ) आने से इस दिन का महत्त्व और भी बढ़ गया हें...
यह योग 20 अक्टूबर को प्रात: 10 :50 से 21 अक्टूबर ,2011 की सुबह 06 बजकर 25 मिनट तक ये शुभ योग रहेगा ...अर्थात लगभग 21 घंटे तक...इन योगों के कारण बाजार में खरीददारी बढ़ेगी..

20 अक्टूबर को लाभकारी चौघडिय़ा मुहूर्त:--

लाभ व अमृत का-
-सुबह 10 :20 से दोपहर 03 बजकर 25 मिनट तक लाभ और अमृत के चौघडिय़ा रहेंगे...इस मुहूर्त में विद्या,व्यापर आरम्भ और गृह पूजन/प्रवेश उत्तम रहेगा...
शुभ और अमृत
--इसके बाद सायंकाल /दोपहर में..05 बजे से 07 :30 तक शुभ और अमृत के चोघडिये रहेंगे..इस दोरान वहां,सोना-चंडी, इलेक्ट्रोनिक सामान अदि की खरीददारी अति उत्तम रहेगी..

इन योग का किस राशी पर क्या होगा प्रभाव:

01.-मिथुन,कन्या,कर्क और मकर राशी वाले जातकों के लिए आशा/उम्मीद से अधिक फलदायी/लाभकारी रहेगा...
02.-तुला,कुम्भ,वृषभ और वृश्चिक राशी के लिए इस अवसर की खरीददारी शुभ फलदायी होगी...
03.-मेष,सिंह,धनु और मं राशी के जातकों के लिए ये योग सामान्य फलदायी रहेगा..

क्या-क्या खरीदें और किसमें होगा लाभ..?
इस दिन..वाशिंग मशीन,लेपटोप,फ्रिज,टेलीविजन,कम्प्यूटर,मोबाईल,के आलावा कर, मोटर साईकल और भूमि,भवन एवं बर्तन से भी लाभ होगा...!!!
पीली वस्तु, सोना -चांदी खरीदना भी शुभ फल प्रदान करेगा...

इस दिन उत्तर दिशा की यात्रा..श्रेष्ठ और लाभकारी रहेगी....
दीक्षा कार्य ,शिक्षा आरम्भ,शेक्षिक कार्य और ब्राह्मण को दिया गया दान अत्यंत शुभ फलदायी होगा...

गुरुवार को हर प्रकार की खरीदी, नए कार्य आरंभ के लिए सर्वश्रेष्ठ समय माना जा रहा है। 20 अक्टूबर को सुबह करीब 10.45 बजे तक पुनर्वसु नक्षत्र है। इसके बाद पुष्य नक्षत्र लगेगा, यह अगले दिन 21 अक्टूबर की सुबह 10.45 बजे तक बना रहेगा। वैसे तो 24 घंटे तक पुष्य नक्षत्र रहेगा लेकिन गुरु-पुष्य का संयोग ही सर्वश्रेष्ठ है। दीपावली के पहले गुरु-पुष्य का संयोग चार साल पहले 2007 में बना था।

स्फटिक श्री यंत्र के साथ व्यापार वृद्धी यंत्र बिल्कुल फ्री संपर्क करें..

एकाक्षी नारियल पूजन

स्फटिक श्री यंत्र के साथ व्यापार वृद्धी यंत्र बिल्कुल फ्री संपर्क करें..
स्फटिक श्रीयंत्र, व्यापार वृद्धी यंत्र, एक मुखी रूद्राक्ष, एकाक्षी नारियल, शत्रु विनाशक श्री बगलामुखी यंत्र,इन सभी यंत्रों को एक साथ रखने से पूर्णत: लक्ष्मी स्थायी तौर पर घर व प्रतिष्ठान में निवास करने के लिए बाध्य हो जातीं हैं. तो सज्जनों आपके सुविधा के लिए पिछले वर्ष की भांति इस वर्ष भी  ज्योतिष का सूर्य ने अपने सभी पाठकों एवं उनके इष्ट मित्रों के लिए यह सुविधा प्रदान करने का निर्णय लिया है, जो 20 अक्टूबर 2011 से दिपावली 26 अक्टूबर 2011 के अद्र्ध निशा में 21 विद्वान ब्राह्मणों द्वारा सिद्ध किया जाना तय किया गया है, ताकि वह यंत्र अधिक से अधिक चार्ज हो सके। अतएव अद्भूत एवं शक्तिशाली यंत्रों के लिए आपको आगामी रजिस्ट्रेसन कराना अनिवार्य है। अत: आप अपना नाम और गोत्र के साथ ही साथ 11000 रू.(250 ग्राम स्फटिक श्रीयंत्र पैकेज), 7500 रू.(101 ग्राम स्फटिक श्रीयंत्र पैकेज), 5100रू.(51 ग्राम स्फटिक श्रीयंत्र) इनमें से अपनी इच्छानुसार चयन धनराशि को‘Jyotish ka surya’  Oriental Bank Of Commerce..A/C.No.14351131000227 खाते में जमा करने के बाद संपर्क करें और अपना नाम गोत्र बतायें...क्योंकि आपके नाम और गोत्र अथवा फर्म के नाम पर संकल्पीत कर यंत्र को सिद्ध किया जाता है।
मोबा.नं.09827198828, 09755969999


महालक्ष्मी पूजन करने के पश्चात एकाक्षी नारियल का पूजन करना चाहिए । सर्वप्रथम हाथ में अक्षत लेकर निम्नलिखित मन्त्र से एकाक्षी नारियल का ध्यान करें :

द्विजटश्चैकनेत्रस्तु नारिकेलो महीतले ।

चिन्तामणि -सम : प्रोक्तो वांछितार्थप्रदानत: ॥

आधिभूतादि -व्याधीनां रोगादि -भयहारिणीं । विधिवत क्रियते पूजा , सम्पत्ति -सिद्धिदायकम ॥

हाथ में लिए अक्षतों को एकाक्षी नारियल पर चढा दें । अब एकाक्षी नारियल का पूजन निम्न प्रकार से करें :

तीन बार जल के छींटे दें और बोलें : पाद्यं , अर्घ्यं , आचमनीयं समर्पयामि ।

स्नानं समर्पयामि । एकाक्षी नारियल पर जल के छींटे दें ।

पंचामृत स्नानं समर्पयामि । एकाक्षी नारियल पर पंचामृत के छींटे दें ।

पंचामृतस्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि । एकाक्षी नारियल को शुद्ध जल से स्नान कराए ।

सिन्दूरं समर्पयामि । घी मिश्रित सिन्दूर का लेप करें और वर्क चढाए ।

सुवासितं इत्रं समर्पयामि । एकाक्षी नारियल पर इत्र चढाए ।

वस्त्रं समर्पयामि । एकाक्षी नारियल पर मौली चढाए ।

गन्धं समर्पयामि । एकाक्षी नारियल पर रोली अथवा लाल चन्दन चढाए ।

अक्षतान समर्पयामि । एकाक्षी नारियल पर चावल चढाए ।

पुष्पं समर्पयामि । एकाक्षी नारियल पर पुष्प चढाए ।

धूपम आघ्रापयामि । एकाक्षी नारियल पर धूप करें ।

दीपकं दर्शयामि । एकाक्षी नारियल को दीपक दिखाए ।

नैवेद्यं निवेदयामि । एकाक्षी नारियल पर प्रसाद चढाए ।

आचमनं समर्पयामि । एकाक्षी नारियल पर जल के छींटे दें ।

ऋतुफलं समर्पयामि । एकाक्षी नारियल पर ऋतुफल चढाए ।

ताम्बूलं समर्पयामि । एकाक्षी नारियल पर पान , सुपारी , इलायची आदि चढाए ।

दक्षिणां समर्पयामि । एकाक्षी नारियल पर नकदी चढाए ।

कर्पूरनीराजनं समर्पयामि । कर्पूर से आरती करें ।

नमस्कारं समर्पयामि । नमस्कार करें ।

अन्त में निम्नलिखित मन्त्र से हाथ जोडकर प्रार्थना करें :

? श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं महालक्ष्मीस्वरुपाय एकाक्षिनारिकेलाय नम: सर्वसिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा ॥

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

''ज्योतिष का सूर्य'' के साथ हिन्दी फिल्म अभिनेता अवतार गील














''ज्योतिष का सूर्य'' के साथ हिन्दी फिल्म अभिनेता अवतार गील
 चित्र में पत्रिका के संपाद ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे एवं फिल्म अभिनेता अवतार गील और देश के जाने-माने कमर्स गुरू डॉ.संतोष राय । ज्ञात हो कि  कल दिनांक १५-१०-२०११ को प्रोफेशनल कैरियर एण्ड कम्प्यूटर के डायरेक्टर कामर्स गुरू संतोष रॉय के घर भिलाई शहर पहुँचे में अवतार गिल ने थियेटर की पृष्ठभूमि से ले कर देश के अनेक मुद्दों पर ''ज्योतिष का सूर्य'' के विशेष संवाददाता संतोष मिश्रा (दुर्ग जिला ब्यूरो प्रमुख ) से लम्बी चर्चा के अलावा श्री गील ने उक्त पत्रिका को सराहते हुए कहा की यह समाज के हर वर्ग के लिए पठनीय है।   मैं और मेरा पूरा  परिवार इस पत्रिका को लाईक करता है हर अंक हमारे निवास मुंबई श्री चौबे जी के द्वारा नियिमत भेजी जाती है।

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

भाजपा के रथ पर सवार आडवाणी और विरथ कांग्रेस

संपादकीय
भाजपा के रथ पर सवार आडवाणी और विरथ कांग्रेस
- पं. विनोद चौबे

रथ आवाम से नहीं जोड़ता, जनता से दूर ले जाता है। रथ सामंती प्रतीक है। हमारी परंपरा में रावण रथी है, और रघुवीर विरथ। बावजूद उनको रथ पर सवार होना क्या जरूरी था क्या इसके अलावा और कोई दुसरा विकल्प नहीं था..? आडवाणी जी 'आदि रथयात्री  हैं। उनकी यात्रा के निहितार्थ सब जानते हैं।

लालकृष्ण आडवाणी का अपनी 38 दिन में 7600 किलोमिटर की  'जन चेतना यात्राÓ की शुरुआत जयप्रकाश नारायण के जयंती के अवसर पर उनके गांव छपरा के सिताब दियारा से करना प्रतीकात्मक रूप से खास महत्व का है। लोकनायक जयप्रकाश नारायण की स्वतंत्रता संग्राम और आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण में विशेष भूमिका रही, लेकिन आज की पीढ़ी उन्हें ज्यादातर 1970 के दशक के उस आंदोलन के लिए ही जानती है, जिसका केंद्रीय बिंदु भ्रष्टाचार मिटाना था।
आज लोकनायक की जयंती पर आडवाणी उनके गांव से भ्रष्टाचार विरोधी अपने अभियान पर निकलेंगे। आडवाणी लंबी रथयात्राओं के लिए जाने जाते हैं, लेकिन शायद पहली बार वे एक ऐसे मुद्दे को लेकर जनता के बीच उतरे हैं, जिसका परिप्रेक्ष्य व्यापक है। यह रथयात्रा 23 राज्यों से गुजरने वाली 40 दिन की इस यात्रा के दौरान मनमोहन सिंह सरकार उनके खास निशाने पर होगी। यहां एक दुसरे पहलु पर भी गौर करने की बात है कि रथ आवाम से नहीं जोड़ता, जनता से दूर ले जाता है। रथ सामंती प्रतीक है। हमारी परंपरा में रावण रथी है, और रघुवीर विरथ। बावजूद उनको रथ पर सवार होना क्या जरूरी था क्या इसके अलावा और कोई दुसरा विकल्प नहीं था..? आडवाणी जी 'आदि रथयात्री हैं। उनकी यात्रा के निहितार्थ सब जानते हैं।
देश उस मुकाम पर है जहां से राजनीति के सूत्र युवाओं के हाथ जा रहे हैं। देश के 72 करोड़ 99 लाख मतदाताओं में 50 प्रतिशत युवा हैं। राहुल गांधी मुकाबले में हैं। युवा आगे देख रहा है। रथ पीछे ले जाता है। इसलिए आडवाणी की रथयात्रा युवावर्ग को लुभाती नहीं है। शायद इसी सोच से संघ और भाजपा अपना नेता बदलना चाहते हैं। वे दूसरी पीढ़ी को सत्ता सौंपना चाहते हैं। दरअसल आडवाणी जी दो परिवारों के बीच फंसे हैं। एक उनका अपना परिवार है, जो उन्हें प्रधानमंत्री देखना चाहता है। उनकी दलील है कि मोरारजी तो 83 की उम्र में प्रधानमंत्री बने थे। फिर दादा की सेहत अच्छी है। दिमाग दुरुस्त है। दूसरा है संघ परिवार, जो किसी कीमत पर आडवाणी को अब मुख्यधारा में रहने देना नहीं चाहता। यही वजह है कि आडवाणी के इस रथयात्रा निकलने तक जो माहौल होना चाहिए सह इस बार माहौल पैदा करने में असमर्थ रही। पार्टी के बड़े नेताओं और मुख्यमंत्रियों ने हाथ खींच लिए हैं। पार्टी का यह रुख देख आडवाणी जी ने रथयात्रा नीतीश कुमार के हवाले कर दी है। लालकृष्ण आडवाणी ने निश्चित तौर पर भाजपा को सत्ता की राजनीति के सर्वश्रेष्ठ दिन दिखाए हैं। जनसंघ से भाजपा तक उनका योगदान बेजोड़ रहा है। उनकी पहली रथयात्रा ने पूरे देश में रामजान्मभूमि आंदोलन के लिए एक उफान पैदा किया था। आडवाणी की खुद की यात्रा भी कम रोचक नहीं है। पहले वह अटल बिहारी वाजपेयी के सहायक रहे। फिर उनके समकक्ष हुए। बाद में प्रतिद्वंद्वी बने। यह संयोग है कि वाजपेयी के प्रतिद्वंद्वी बनने के बावजूद आडवाणी तभी तक ताकतवर थे, जब तक वे वाजपेयी की छाया में थे। बाद में उन्हे लगा कि प्रधानमंत्री बनने के लिए अटल जैसा उदार चेहरा चाहिए। इसके लिए उन्होंने जिन्ना का सहारा ले लिया। बस यहीं से गड़बड़ हुई। इसके बाद संघ ने उनसे राजनैतिक नेतृत्व जबरन दूसरी पीढ़ी को दिलवाया। फिर नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी छीनी। अब आडवाणी क्या करें? एक- उन्हें चुनाव न लडऩे की घोषणा करनी चाहिए। दो- उन्हें जयप्रकाश नारायण की तरह व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का ऐलान करना चाहिए। खुद को सत्ता की दौड़ से बाहर बताना चाहिए। दरअसल लालकृष्ण आडवाणी के लिए यह तय करने का वक्त आ गया है कि वे राजनीति से सुनील गावस्कर की तरह शतक लगाकर रिटायर होंगे। या कपिलदेव की तरह रिटायर किए जाएंगें। फिलहाल, उनका रास्ता कपिलदेव की ओर जा रहा है।
हाल के घोटालों और विदेशों में जमा काले धन के सवाल से आडवाणी सत्ताधारी गठबंधन को घेरने की कोशिश करेंगे। पर्यवेक्षकों की निगाह इस पर होगी कि इस पर जनता की कैसी प्रतिक्रिया मिलती है? अगले चुनावों में भाजपा की रणनीति काफी कुछ इस प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगी।
अगर लोगों ने उत्साह दिखाया, तो भाजपा के लिए किसी अन्य मुद्दे की दरकार शायद नहीं रहेगी। उस हाल में पार्टी या संघ परिवार के लिए आडवाणी को दरकिनार करना भी कठिन हो जाएगा, जैसी मंशा उनके बीच हाल में दिखी है।
कुल मिलाकर नीतिश कुमार के हरी झंडी दिखाने के बाद आडवाणी की यह जनचेतना यात्रा प्रारंभ हुई और वहीं लालू प्रसाद यादव ने जय प्रकाश नारायण की इस पावन भूमि को दूषित करना बताया।